(Dilip Kumar) एक जबरदस्त ऐक्टर थे। वह पर्दे पर अपनी एक झलक से दर्शकों को रूलाते भी थे और हंसाते भी। बॉलिवुड ने उन्हें भले ही 'ट्रेजडी किंग' का नाम दिया, लेकिन उनकी कॉमिक टाइमिंग भी बहुत अच्छी थी। दिलीप साहब के बारे में कई ऐसी बातें हैं, जिनसे हम में से बहुत से लोग अभी तक अनजान हैं। एक ऐसी ही जानकारी यह है कि दिलीप कुमार एक बेहतरीन सिंगर () भी थे। लता मंगेशकर () के साथ उनका करीबी रिश्ता रहा है। दिलीप साहब, लता जी को छोटी बहन मानते थे। दिलचस्प बात यह है कि एक फिल्म के लिए उन्होंने लताजी के साथ एक गाना भी गाया था। गाने, गुनगुनाने के बड़े शौकीन थे दिलीप साहब दिलीप साहब करीब 58 साल तक फिल्मी दुनिया में ऐक्टिव रहे। 50, 60 और 70 के दशक में उनकी तूती बोलती थी। वह गाने के बड़े शौकीन थीं। खुद लता मंगेशकर इस बात का जिक्र अपने एक इंटरव्यू में करती हैं। वह कहती हैं, 'यूसुफ साहब को गाना बहुत पसंद था। हमने एक फिल्म में साथ में गाना भी गाया।' हालांकि, यह दुर्भाग्य रहा कि यह पर्दे पर किसी फिल्म में गाया दिलीप कुमार का पहला और आखिरी गाना था। 'मुसाफिर' फिल्म के लिए गाया 'लागी नहीं छूटे' सॉन्ग दिलीप कुमार ने लता मंगेशकर के साथ हृषिकेश मुखर्जी की फिल्म 'मुसाफिर' के लिए 'लागी नहीं छूटे' सॉन्ग गाया था। यह फिल्म 1957 में रिलीज हुई थी। यह एक सेमी क्लासिकल सॉन्ग है। इस गाने को तब ठीक-ठाक रेस्पॉन्स मिला था। फिल्म 'मुसाफिर' की कहानी तीन परिवारों के इर्द-गिर्द बुनी गई है। इस फिल्म में दिलीप कुमार के साथ किशोर कुमार, केष्टो मुखर्जी, सुचित्रा सेन और निरुपा रॉय जैसे दिग्गजों ने काम किया है। बुधवार को पलभर के लिए रुक गई देश की धड़कनबुधवार, 7 जुलाई 2021 को मुंबई के हिंदुजा अस्पताल में दिलीप कुमार ने आखिरी सांसें लीं। सुबह 7:30 बजे उनका निधन हुआ और इस खबर ने जैसे एक पल के लिए हर किसी को शून्य में भेज दिया। वह 98 साल के थे, इसलिए हर कोई यह जानता था कि कुरदत का यह फरमान देर-सवेर आएगा। लेकिन दिलीप साहब के रूप में सिनेमा के एक ऐसे युग का अंत हुआ है, जिसे शायद ही फिर कभी दोहराया जा सकता है। लता बोलीं- कुछ सूझ नहीं रहा, दुखी हूं, निशब्द हूं लता मंगेशकर ने इंस्टाग्राम पर दिलीप कुमार को याद करते हुए लिखा, 'यूसुफ भाई आज अपनी छोटीसी बहन को छोड़के चले गए.. यूसुफ भाई क्या गए, एक युग का अंत हो गया। मुझे कुछ सूझ नहीं रहा। मैं बहुत दुखी हूं, नि:शब्द हूं। कई बातें, कई यादें, हमें देके चले गए। यूसुफ भाई पिछले कई साल से बीमार थे, किसी को पहचान नहीं पाते थे। ऐसे वक्त में सायरा भाभी ने सब छोड़कर उनकी दिन रात सेवा की है, उनके लिए दूसरा कुछ जीवन नहीं था। ऐसी औरत को मैं प्रणाम करती हूं और यूसुफ भाई की आत्मा को शान्ति मिले ये दुआ करती हूं।'
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