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Saturday, August 14, 2021

मूवी रिव्यू: 'भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया', जब सिपाहियों के साथ गांव की महिलाओं ने भी मिलाया था हाथ

कहानी: फिल्म की कहानी 1971 में इंडिया और पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध की है। इस दौरान पाकिस्तानी सैनिकों ने भुज एयरबेस पर जोरदार हमला किया था, जिसके बाद वहां पास के गांव माधापार में रहने वाली 300 महिलाओं ने अपनी जिंदगी को दांव पर लगाकर इंडियन एयरफोर्स के रनवे की रातों-रात मरम्मत कर डाली ताकि वहां भारतीय सैनिक उनकी मदद के लिए पहुंच सकें। भुज एयरबेस के स्क्वाड्रन लीडर विजय कार्णिक (अजय देवगन) ने रनवे पट्टी को रिपेयर करने के लिए उन स्थानीय लोगों प्रेरित किया था। यह फिल्म संकट की घड़ी में देश के नागरिकों और इंडियन आर्म्ड फोर्सेस के सहयोग की याद दिलाती है। रिव्यू: साल 1971 में इंडिया-पाकिस्तान युद्ध पाकिस्तान से बंग्ला देश की आजादी की कहानी का परिणाम था। चूंकि भारत ने वेस्ट पाकिस्तान (जो अब पाकिस्तान है) के आत्याचारों के बाद उससे अलग होने में ईस्ट पाकिस्तान (अब बंगला देश) की मदद की, बौखलाया पाकिस्तान भारत के वेस्टर्न रीज़न पर इसलिए हमला करता है ताकि इसके बाद वह भारत से सौदा कर सके और बदले में ईस्ट पाकिस्तान हासिल कर सके। इस स्ट्रैटिजी के तहत कई इंडियन एयर बेस पर बमबारी की गई। भुज एयरबेस, इंडियन एयर फोर्स के सबसे महत्वपूर्ण ठिकानों में से एक था, जिसे काफी नुकसान पहुंचाया गया था। 8 दिसम्बर की रात, पाकिस्तान एयर फोर्स के फाइटर जेट्स ने करीब 14 से अधिक नापाम बम भुज के इंडियन एयरबेस के रवनवे पर गिराए। इसकी वजह से रनवे इस तरह बर्बाद हुआ कि वहां से एयरक्राफ्ट्स की लैंडिंग और टेक ऑफ मुश्किल था। चूंकि इस हमले में रनवे के अलावा भुज को कनेक्ट करने वाले सभी रास्तों पर जोरदार हमला किया गया था इसलिए बॉर्डर सिक्यॉरिटी फोर्स को भी वहां तक पहुंचने में काफी वक्त लगता और उस वक्त इंडियन एयरफोर्स वक्त और रनवे पर काम करने के लिए मजदूरों की कमी से जूझ रही थी। इस मुश्किल घड़ी में मधापार के 300 आम नागरिकों ने देश के जांबाजों के लिए मदद का हाथ उठाया, जिनमें से अधिकतर महिलाएं थीं। देश को दुश्मनों के हाथ में जाने से बचाने के लिए 72 घंटे के अंदर सबने मिलकर एयरबेस के रनवे को रिपेयर कर डाला। डायरेक्टर अभिषेक दुधैया की फिल्म 'भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया' इन्हीं योद्धाओं की बहादुरी की असाधारण कहानी है, जो कही जानी जरूरी है। अजय देवगन ने इस कहानी को जिस दिलेरी के साथ पेश किया है, वह शानदार है। 'भुज' मेकर्स ने पहले ही डिस्क्लेमर में यह साफ कर दिया है कि फिल्म की कहानी सच्ची घटनाओं से प्रेरित लेकिन काल्पनिक है। यानी यह बताता है कि इतिहास की इस कहानी को दोहराने के लिए नाटकीय अप्रोच का भी इस्तेमाल किया गया है। फिल्म कई बार कहानी की बारीकियों से दूर होती भी नजर आती है। फिल्म की कहानी में मिलिट्री ऑपरेशन के साथ इमोशनल भजन दिखाया गया है। रनवे रिपेयर के बाद तेज आवाज में भजन गाया जा रहा है ढोल बजाए जा रहे हैं, जो कि एक गुप्त ऑपरेशन है और यह अगले हमलों को बुलावा दे सकता है। वास्तव में कहानी कुछ ऐसी थी कि भुज की महिलाएं हरे रंग के कपड़ों में जाती हैं और शरीर के ऊपर गोबर की स्ट्रिप लगाती हैं ताकि दुश्मनों की नजरों से खुद को बचाया जा सके। वसे तो ड्रामे को नजरअंदाज किया जा सकता है, लेकिन इस तरह की कहानी में तर्क को ताक पर रखना डाइजेस्ट नहीं होता। कहानी को थोड़ी और सावधानी के साथ लिखी जानी चाहिए थी। फर्स्ट हाफ ढेर सारे कैमियो कैरक्टर्स और बेमौके बहादुरी के भाषण से काफी बिखरा सा लगता है। भुज एयरबेस पर अटैक को अल्टा-पुल्टा दिखाया गया है। हालांकि, फिल्म सेकंड हाफ में अपने रियल लोकेशन पर आती है, जिसपर यह कहानी बनी है। हालांकि, कहानी आपको थामकर रखती है। विघाकोट पोस्ट और देश की सुरक्षा में लगे 120 सैनिकों से लेकर ट्रक के सहारे प्लेन को लैंड कराना ये सभी सीन ऐक्शन गेम में शानदार हैं। आसमान में फाइटर प्लेन के बीच की जंग भी आपको बांधकर रखती है। साउंड और विज़ुअल बिग स्क्रीन के हिसाब से हैं। वीएफएक्स बिल्कुल साधारण हैं, वहीं साउंड आपको रणभूमि तक ले जाने के लिए काफी हैं। अजय देवगन के स्लो मोशन के कई शॉर्ट्स हैं जो और वह अपने कैरक्टर में पूरी तरह से ढले नजर आ रहे हैं। संजय दत्त, सोनाक्षी सिन्हा, शरद केलकर, नोरा फतेही और एमी विर्क ने अपने-अपने किरदारों को बखूबी निभाया है। नवनी परिहार भी इंदिरा गांधी के कैमियो रोल में जंच रही हैं। क्यों देखें: यदि आप धार्मिक प्रोपोगैंडा को इग्नोर कर सकते हैं और सिर्फ कहानी पर फोकस कर सकते हैं तो 'भुज' देखना मजेदार है।


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